वाक्य रचना अन्वय || हिंदी व्याकरण || Hindi Grammar

आज की पोस्ट में हम हिंदी व्याकरण के अंतर्गत वाक्य रचना अन्वय के बारे में जानेंगे ,आप इस टॉपिक को अच्छे से क्लियर करें |

वाक्य रचना अन्वय

 

जिस पद्धति द्वारा लिंग, वचन, कारक, काल, पुरुष के अनुसार वाक्य में प्रयुक्त विभिन्न पदों का एक-दूसरे के साथ अन्वय या मेल दिखाया जाता है उसे ’अन्वय’ कहते हैं। यह अन्वय मुख्यतः चार प्रकार से होता है –

  • कर्ता और क्रिया का अन्वय
  • कर्म और क्रिया का अन्वय
  • संज्ञा और सर्वनाम का अन्वय
  • विशेषण और विशेष्य का अन्वय

1. कर्ता और क्रिया का अन्वय –

(क) यदि वाक्य में कर्ता का ’ने’ चिह्न प्रकट हो और कर्म के साथ ’को’ चिह्न आया हो या कर्म का प्रयोग ही न हो तो क्रिया सदा अन्यपुरुष, एकवचन, पुल्लिंग रहती है। जैसे – उसने राम को देखा, सीता ने कहा। पहले वाक्य में कर्म के साथ ’को’ चिह्न आया है और दूसरे में कर्म का प्रयोग नहीं है।

(ख) यदि वाक्य में कर्ता के साथ ’ने’ चिह्न रहने पर कर्म के साथ ’को’ चिह्न न हो या ’को’ के अर्थ से युक्त सर्वनाम के ’उसे’, ’मुझे’ आदि रूप न हों तो क्रिया कर्म के लिंग, वचन, पुरुष के अनुसार होती है। जैसे – उसने आम खाया, मैंने रोटी खायी, उसने फल देखे हैं, आदि।

(ग) यदि वाक्य में कर्ता कई हों तो क्रिया बहुवचन में होती है। लिंग कर्ता के अनुसार ही रहता है। जैसे – राम और श्याम आते हैं। सीता और राधा खेलती है।

(घ) यदि वाक्य में कई कर्ता हों, परंतु वे एक ही अर्थ को प्रकट करते हों तो क्रिया एकवचन में ही होती है। जैसे – मुझे दुःख और क्षोभ हुआ।

(च) यदि वाक्य में एक से अधिक प्राणिवाचक संज्ञाओं के कर्ता का एकवचन में प्रयोग हो, परंतु उनके लिंग परस्पर भिन्न हों तो कर्ता के साथ आनेवाली क्रिया बहुधा एकवचन और पुल्लिंग होती है।

उदाहरण –

दुष्यन्त और शकुन्तला आ रहे हैं। राम लक्ष्मण और सीता शिला पर बैठे हैं। कुत्ता और बिल्ली बैठे हैं।

(छ) यदि वाक्य में दोनों लिंगों और वचनों के अनेक चिह्नरहित कर्ता हों और अंतिम कर्ता के पूर्व ’और’ आदि संयोजक हो तो क्रिया बहुवचन में प्रयुक्त होगी तथा लिंग अंतिम कर्ता के अनुसार होगा। जैसे – एक लङका, तीन बूढ़े और बहुत-सी लङकियाँ आती हैं। एक भैंस, चार गायें और बहुत-से घोङे मैदान में चरते हैं।

(ज) यदि वाक्य में अनेक चिह्नरहित कर्ताओं के बीच ’या’ अथवा ’वा’ जैसे विभाजक समुच्चयवाचक अव्यय हों तो अंतिम कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार क्रिया प्रयुक्त होगी। जैसे – दो कम्बल या एक चादर बिकेगी। रामू के दो कम्बल या चार दरियाँ बिकेंगी। उसकी गाय या बैल बिकेगा।

(झ) वाक्य में क्रियार्थक संज्ञा की क्रिया सदा एकवचन, पुल्लिंग और अन्यपुरुष में प्रयुक्त होती है। जैसे – उसका हँसना बुरा लगा। तुम्हारा गाना अच्छा लगा।

(ट) यदि वाक्य में ’आप’ का कर्ता के रूप में प्रयोग हो तो क्रिया बहुवचन में और ’आप’ के लिंग के अनुसार ही रहेगी। जैसे – आप पढ़ते हैं। आप देखती है।

(ठ) यदि वाक्य में चिह्नरहित आदरणीय कर्ता एकवचन में आये तो आदर व्यक्त करने के लिए उसकी क्रिया बहुवचन में प्रयुक्त होती है। जैसे – वह विद्यालय आएँगे। श्री मार्तंडजी आज बनारस जाएँगे।

अन्य अन्वय

(ड) यदि वाक्य में ईश्वर-वाचक शब्द कर्ता के रूप में आया हो तो क्रिया का प्रयोग एकवचन में होता है। जैसे – उसने धोखा नहीं दिया – ईश्वर ही साक्षी है। ईश्वर, तू ही मेरा सहारा। भगवान जाने क्या होनेवाला है।

(ढ) यदि वाक्य में आँसू, दर्शन, प्राण, अक्षत, हस्ताक्षर, ओठ आदि आये हों तो क्रिया का प्रयोग बहुवचन में पाया जाता है। जैसे – राम की आँखों से आँसू टपक पङे।

(त) यदि वाक्य में कर्ता या कर्म का जिसके अनुसार क्रिया के लिंग या वचन का प्रयोग होता है – लिंग स्पष्ट न हो तो क्रिया सदा पुल्लिंग एकवचन में प्रयुक्त होती है। जैसे – वेदों में लिखा है। गरीबों की पुकार यहाँ कौन सुनेगा?

(ध) वाक्य में मुख्य कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार ही क्रिया के लिंग और वचन होते हैं, विधेय के रूप में प्रयुक्त अप्रधान कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार नहीं।

उदाहरण –

कोयला राख बन गया, आँसू बन गये मोती, लङकी सूखकर काँटा हो गयी, लङका सूखकर काठ हो गया, वाराणसी प्राचीनकाल से संस्कृति का केन्द्र रही है, कभी कलकत्ता भारत की राजधानी था।

(द) यदि वाक्य में भिन्न-भिन्न लिंग-वचन की एक से अधिक संज्ञाएँ प्रत्ययरहित कर्ता बनकर आएँ तो क्रिया के लिंग-वचन अंतिम कर्ता के अनुसार होंगे। जैसे – राजा और प्रजा उनके गुणों को अच्छी तरह जानती है, रावण के दस सिर और बीस भुजाएँ थीं, आलमारी में रजिस्टर और डायरी नहीं मिलेगी, हवा के झकोरे और वर्षा की बूँदें बङी सुहानी लग रही थीं, शूर्पणखा की नाक और कान काटे गये।

(ध) यदि एक ही वाक्य में तीनों पुरुष (उत्तम, मध्यम, अन्य) कर्ता हों, तो क्रिया उत्तम पुरुष के अनुसार होगी। जैसे – वह तुम और मैं पढूँगा। तुम और हम चलेंगे।
यदि मध्यमपुरुष और अन्यपुरुष के कर्ता एक साथ हों तो क्रिया मध्यमपुरुष के अनुसार होगी। जैसे – तू और वह अवश्य आना।

2. कर्म और क्रिया का अन्वय –

(क) यदि कर्ता ’ने’ विभक्ति के साथ हो और कर्म की ’को’ विभक्ति लुप्त हो तो उसकी क्रिया कर्म के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार ही होगी। जैसे – मोहन ने पुस्तक पढ़ी, सीता ने आम खाया, मैंने पैसे लिये, तुमने भिक्षा माँगी, रमेश ने चार नारंगियाँ खरीदीं।

(ख) यदि कर्ता ’ने’ विभक्ति के साथ और कर्म ’को’ विभक्ति के साथ हो तो क्रिया सर्वदा एकवचन, पुल्लिंग तथा अन्यपुरुष में होगी। जैसे – मैंने राधा को खिलाया, तुमने किसको देखा, बच्ची ने बच्चे को मार दिया।

(ग) यदि विभक्तियुक्त कर्ता के साथ कर्म से लगी किसी क्रियासार्थक संज्ञा का प्रयोग हो तो क्रिया सर्वदा पुल्लिंग, एकवचन तथा अन्य पुरुष में होगी। जैसे – तुम्हें सितारा बजाना नहीं आता, मुझे रसोई बनाना नहीं आता, मंजु को नाव चलाना नहीं आता।

(घ) यदि एक ही लिंग और एकवचन ही अनेक प्राणिवाचक संज्ञाएँ प्रत्ययहीन कर्मकारक के रूप में प्रयुक्त हों तो क्रिया अंतिम के लिंग और बहुवचन में होती है। जैसे – उन्होंने गाय और भैंस खरीदीं, उस भाग्यवान से नाती और पोते देेखे, हमने चीता और भेङिया देखे, तुमने हाथी और बैल मोल लिए।

(च) यदि एक ही लिंग और एकवचन की अनेक प्राणिवाचक संज्ञाएँ विभक्तिरहित कर्म के रूप में प्रयुक्त हों और उनसे पार्थक्य का भान होता हो तो क्रिया एकवचन में आयेगी।

उदाहरण –

तुमने एक घोङा और एक बैल बेचा, बूढ़े ने नाती और पोता देखा, उसने एक गाय और एक भैंस खरीदी।

(छ) यदि एक ही लिंग की एकवचन अप्राणिवाचक संज्ञाएँ या भाववाचक संज्ञाएँ विभक्तिरहित कर्म के रूप में प्रयुक्त हों तो क्रिया एकवचन में रहेगी। जैसे – उसने झोली से ग्लास और लोटा निकाला, मोहन ने बक्स में सूई और कैंची रख दी, उसने इस विपत्ति में धीरज और साहस दिखाया।

(ज) यदि भिन्न-भिन्न लिंगों की प्राणिवाचक या अप्राणिवाचक संज्ञाएँ एकवचन में आकार विभक्तिरहित कर्म के रूप में प्रयुक्त हों तो क्रिया एकवचन में रहेगी। जैसे – उसने लङका और लङकी देखे, किसान ने बछङा और गाय बेचे, राजा ने सेवक और सेविका भेजे, तुमने मिठाई और पापङ खाये, उसने भात और दाल खिलाये।

(झ) यदि भिन्न-भिन्न लिंगों और वचनों की अनेक संज्ञाएँ विभक्तिरहित कर्मकारक के रूप में प्रयुक्त हों तो क्रिया अंतिम कर्म के अनुसार ही होगी।

उदाहरण –

दर्जी ने कमीजें और पाजामे तैयार किये। उसने अपने पास संतरे, मौसमियाँ, केले और शराब रख ली। उसकी आलमारी में अनेक ग्रन्थ, फाइलें और डायरियाँ रखी हुई हैं।

(ट) यदि अनेक संज्ञाएँ विभक्तिरहित कर्म कारक के रूप में प्रयुक्त होकर एक ही व्यक्ति या वस्तु का बोध करायें तो क्रिया एकवचन में रहती है। जैसे – मैंने उसे एक अच्छा मित्र और सहयोगी पाया। लङकी ने ’धरती की बेटी’ पढ़ी। क्या तुमने ’सागर, लहरें और मनुष्य’ पढ़ी?

(ठ) यदि दो कर्मों का प्रयोग हो तो क्रिया प्रधान कर्म के अनुसार होती है। जैसे – मैंने मोहन को एक नारंगी दी। उसने सीता को एक आम दिया। यदु ने राधा को तीन संतरे दिये।

(ड) यदि विभक्तिरहित कर्मों का कोई समानाधिकरण शब्द प्रयुक्त हो तो क्रिया समानाधिकरण शब्द के अनुसार ही होती है। जैसे – उसने धन, मान, कीर्ति -सब-कुछ पाया। श्रीराम ने घर-बार, धन-संपत्ति, ऐश-आराम-सब-कुछ त्याग दिया।

(ढ) यदि विभक्तिरहित कर्म विभाजक अव्यय द्वारा जुङे हो तो क्रिया अंतिम कर्म के अनुसार होती है। जैसे – तुमने धोती या कुत्र्ता लिया होगा। बच्चे ने कागज या कलम पायी थी।

3. संज्ञा और सर्वनाम का अन्वय –

(क) वाक्य में संज्ञा के लिंग, वचन और पुरुष के अनुसार ही सर्वनाम के लिंग, वचन और पुरुष होते हैं। जैसे – बच्चों ने कहा कि हम भी बाजार जाएँगे। श्याम ने कहा कि मैं भी पढूँगा।

(ख) यदि वाक्य में अनेक संज्ञाओं के बदले एक ही सर्वनाम प्रयुक्त हो तो उसके लिंग और वचन संज्ञाओं के लिंग और वचन के अनुसार ही होंगे। जैसे – बालमुकुन्द और नरेश घर गये हैं, एक सप्ताह के बाद ही वे लौटेंगे। अभी-अभी महेन्द्र यहाँ था, पता नहीं वह कहाँ चला गया। शुभ्रा और सुधा अभी तो पढ़ ही रही थीं, कह नहीं सकता वे कहाँ चली गयीं।

4. विशेषण और विशेष्य का अन्वय –

(क) विशेषण का लिंग और वचन हमेशा विशेष्य के अनुसार होता है। जैसे – वह मोटा लङका है। वह नाटी लङकी है।

(ख) यदि वाक्य में कर्म का चिह्न प्रकट रहे, तो उसका विधेय-विशेषण एकवचन पुल्लिंग में रहता है। जैसे – उसने छङी सीधी की। उसने छङी को सीधा किया।

(ग) यदि वाक्य में एक विशेष्य के कई विशेषण हों, तो विशेषण विशेष्य के अनुसार होते हैं। जैसे – काले घने बाल। नीली, पीली तितलियाँ।

(घ) यदि वाक्य में एक विशेषण के कोई विशेष्य हों तो विशेषण प्रथम विशेष्य के अनुसार ही होता है। जैसे- बङे-बङे लङके और लङकियाँ। मोटी-मोटी भैसें और बैल।

कुछ अन्य बातें –

(क) यदि अकर्मक क्रिया का उद्देश्य चिह्नयुक्त हो, तो क्रिया सदा पुल्लिंग एकवचन और अन्यपुरुष में रहती है। जैसे – लङकी से तैरा नहीं जाता। रोगी से चला नहीं जाता।

(ख) यदि दो या उससे अधिक समानाधिकरण वाक्य ’और’ से जुङे हों और भिन्न रूपों में कर्ताकारक आए, तो प्रायः पिछले कर्ताकारक का अध्याहार यथानियम चलता है।

जैसे -मैंने नौकरी छोङ दी है और दर्शन का अध्ययन करने लगा हूँ। मैं अनेक देशों की यात्रा कर चुका हूँ, पर गंगा जैसी नदी कहीं नहीं देखी। यहाँ पहले वाक्य के ’दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने लगा हूँ’ खंड में ’मैं’ कर्ता का और दूसरे वाक्य के ’कहीं नहीं देखी’ खंड में ’मैंने’ कर्ता का अध्याहार होगा।

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